(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

सभापर्व ~ महाभारत | Mahabharat Sabha Parv In Hindi


॥ श्रीः ॥
2.44. अध्यायः 044
Mahabharata - Sabha Parva - Chapter Topics
मधुकैटभवधकथनम्॥ 1॥
Mahabharata - Sabha Parva - Chapter Text

भीष्म उवाच।

अव्यक्तो व्यक्तलिङ्गस्थो य एव भगवान्प्रभुः।
नरनारायणो भूत्वा हरिरासीद्युधिष्ठिर॥ 2-44-1(13100)
ब्रह्मा च शक्रः सूर्यश्च धर्मश्चैव सनातनः।
बहुशः सर्वभूतात्मा प्रादुर्भवति कार्यतः।
प्रादुर्भावांस्तु वक्ष्यामि दिव्यान्देवगणैर्युतान्। 2-44-2(13101)
सुप्त्वा युगसहस्रं स प्रादुर्भवति कार्यवान्।
अनेकबहुसाहस्रैर्देवदेवो जगत्पतिः॥ 2-44-3(13102)
ब्रह्माणं कपिलं चैव परमेष्ठिं तथैव च।
देवान्सप्तर्षिभिश्चैव शङ्करं च महायशाः॥ 2-44-4(13103)
सनत्कुमारं भगवान्मनुं चैव प्रजापतिम्।
पुरा चक्रे च देवादिः प्रदीप्ताग्निसमप्रभः॥ 2-44-5(13104)
येन चार्णवमध्यस्थौ नष्टेस्थावरजङ्गमे।
नष्टदेवासुरवरे प्रनष्टोरगराक्षसे॥ 2-44-6(13105)
योद्धुकामौ सुदुर्धर्षौ भ्रातरौ मधुकैठभौ।
हतौ भगवता तेन ततो दत्त्वा वरं परम्॥ 2-44-7(13106)
भूमिं बद्ध्वा कृतौ पूर्वावजेयौ द्वौ महाऽसुरौ।
तौ कर्णमलसंभूतौ विष्णोस्तस्य महात्मनः॥ 2-44-8(13107)
महार्णवे प्रस्वपतः शैलराजसमौ स्थितौ।
तौ विवेश स्वयं वायुर्ब्रह्मणा साधु चोदितः॥ 2-44-9(13108)
तौ दिवं छादयित्वा तु ववृधाते महाऽसुरौ।
वायुप्रमाणौ तौ दृष्ट्वा ब्रह्मा पर्यमृशच्छनैः॥ 2-44-10(13109)
एकं मृदुतरं वेत्ति कठिनं वेत्ति चापरम्।
नामनी तु तयोश्चके सविता सलिलोद्भवः॥ 2-44-11(13110)
मृदुस्त्वयं मधुर्नाम कठिनः कैठभः स्वयम्।
तौ दैत्यौ कृतनामानौ चेरतुर्बलगर्वितौ॥ 2-44-12(13111)
तौ पुराऽथ दिवं सर्वां प्राप्तौ राजन्महासुरौ।
प्रच्छाद्याथ दिवं सर्वां चेरतुर्मधुकैठभौ॥ 2-44-13(13112)
सर्वमेकार्णवं लोकं योद्धुकामौ सुनिर्भयौ।
तौ गतावसुरौ दृष्ट्वा ब्रह्मा लोकपितामहः॥ 2-44-14(13113)
एकार्णवाम्बुनिचये तत्रैवान्तरधीयत।
स पद्मात्पद्मनाभस्य नाभिदेशात्समुत्थितात्॥ 2-44-15(13114)
आससाद स्वयं जन्म तत्पङ्कजमपङ्कजम्।
पूजयामास वसतिं ब्रह्मा लोकपितामहः॥ 2-44-16(13115)
तावुभौ जलगर्भस्थौ नारायणचतुर्मुखौ।
बहून्वर्षायुतानप्सु शयानौ न च कम्पितौ॥ 2-44-17(13116)
अथ दीर्घस्य कालस्य तावुभौ मधुकैठभौ।
आजग्मतुस्तौ तं देशं यत्र ब्रह्मा व्यवस्थितः॥ 2-44-18(13117)
तौ दृष्ट्वा लोकनाथस्तु रोषात्संरक्तलोचनः।
उत्पपाताथ शयनात्पद्मनाभो महाद्युतिः॥ 2-44-19(13118)
तद्युद्धमभवद्घोरं तयोस्तस्य च भारत।
एकार्णवे तदा घोरे त्रैलोक्ये जलतां गते॥ 2-44-20(13119)
तदभूत्तुमुलं युद्धं वर्षसङ्ख्यासहस्रशः।
न च तावसुरौ युद्धे तदा श्रममवापतुः॥ 2-44-21(13120)
अथ दीर्घस्य कालस्य तौ दैत्यौ युद्धदुर्मदौ।
ऊचतुः प्रीतमनसौ देवं नारायणं प्रभुम्॥ 2-44-22(13121)
प्रीतौ स्वस्तव युद्धेन श्लाघ्यस्त्वं मृत्युरावयोः।
आवां जहि न यत्रोर्वा सलिलेन पिरप्लुता॥ 2-44-23(13122)
हतौ च तव पुत्रत्वं प्राप्नुयाव सुरोत्तम।
यो ह्यानां युधि निर्जेता तस्यावां विहितौ सुतौ॥ 2-44-24(13123)
तयोस्तु वचनं श्रुत्वा तदा नारायणः प्रभुः।
तौ प्रहस्य मृधे दैत्यौ दोर्भ्यां च समपीडयम्॥ 2-44-25(13124)
ऊरुभ्यां निधनं चक्रे तावुभौ मधुकैठबौ।
तौ हतौ चाप्लुतौ तोये वपुर्भ्यामेकतां गतौ॥ 2-44-26(13125)
मेदो मुमुचतुर्दैत्यौ मज्जमानौ जलोर्मिभिः।
मेदसा तज्जलं व्याप्तं ताभ्यामन्तर्दधे तदा॥ 2-44-27(13126)
नारायणश्च भगवानसृजद्विविधाः प्रजाः।
दैत्ययोर्मेदसा छन्ना सर्वा राजन्वसुन्धरा॥ 2-44-28(13127)
तदाप्रभृति कौन्तेय मेदिनीति स्मृता मही।
प्रभावात्पद्मनाभस्य शाश्वती च कृता नृणाम्॥ ॥ 2-44-29(13128)

इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि अर्घाहरणपर्वणि चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः॥ 44॥


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